सेवानिवृत्ति के 11 दिन बाद डिमोशन का दूसरा आदेश जारी कर संयुक्त संचालक से बनाया व्याख्याता

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रायपुर। स्कूल शिक्षा विभाग में अजीबो गरीब मामले सामने आ रहे हैं। दरअसल, विभाग में संयुक्त संचालक आरएन सिंह का उनकी सेवानिवृत्ति से पहले डिमोशन किया गया है। 30 नवंबर को राज्य सरकार के एक आदेश के जरिए आरएन सिंह को संयुक्त संचालक से सहायक प्राध्यापक के पद पर पदस्थ करते हुए सेवानिवृत्ति दी गई थी। बाद में स्कूल शिक्षा विभाग को पता चला कि आरएन सिंह को सहायक प्राध्यापक नहीं, बल्कि व्याख्याता के मूल पद पर डिमोशन करना था।

अफसरों को सूझी कि एक बार पुराने आदेश को वापस लिया जाए। स्कूल शिक्षा विभाग ने अपनी भूल को सुधार कर 11 दिसंबर को एक बार फिर सेवानिवृत्ति का संशोधित आदेश जारी करवाया। इस बार आरएन सिंह को सहायक प्राध्यापक की जगह व्याख्याता बना दिया गया है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार के आदेश को एससीईआरटी के आईएएस अधिकारी डी वेंकट राहुल ने सुधार किया। जबकि जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार के आदेश का संशोधन एससीईआरटी के कनिष्ठ अधिकारी नहीं कर सकते हैं।

स्कूल शिक्षा विभाग में इस तरह की मनमानी आदेश निकलने के बाद पूरी व्यवस्था को लेकर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। इतने बड़े अधिकारी पर कार्यवाही करने से पहले अफ सरों को यह भी नहीं पता था कि आखिर आरएन सिंह का मूल पद क्या है। इसे विभाग की लापरवाही कहें या मनमानी? अब सवाल यह है कि क्या स्कूल शिक्षा विभाग को इतनी बड़ी कार्रवाई करने से पहले यह होश नहीं था कि अफसर किस पद पर पदस्थ थे?

राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के संचालक डी वेंकट राहुल ने इस भूल को सुधारा और उन्होंने पहले निकाले गए आदेश को विलोपित करते हुए आरएन सिंह को संयुक्त संचालक से व्याख्याता पद पर पदस्थ करके सेवानिवृत्ति का आदेश निकाला है। अब सवाल उठ रहे हैं कि डी वेंकट राहुल ने आखिर किस अधिकार से राज्य सरकार के आदेश को संशोधित किया?

गौरतलब है कि स्कूल शिक्षा विभाग ने वर्ष 2008 में आरएन सिंह को प्रमोशन दिया था। आरएन सिंह को सहायक प्राध्यापक से उप संचालक बनाया गया था। प्रमोशन ने तूल पकड़ा और बाद में इस प्रमोशन को लेकर खूब विवाद हुआ। मामले में भाजपा सरकार में ही जांच बिठा दी गई थी। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर शिकायतकतार्ओं ने लगातार विरोध किया। आखिरकार कांग्रेस की सरकार में आरएन सिंह पर कार्रवाई की गई।

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