पुण्यतिथी विशेष – सादगी पसंद गांधीवादी नेता गुलजारी लाल नंदा जिन्होनें दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दी

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भारत के तेरह प्रधानमंत्रियों के अतिरिक्त कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अब तक के एकमात्र ऐसे व्यक्ति रहे, जिन्होंने इस ज़िम्मेदारी को दो बार निभाया। यह प्रासंगिक ही था कि कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में गुलज़ारीलाल नंदा के व्यक्तित्व और कर्तव्य को भी यहाँ पर प्रस्तुत किया जाता। दरअसल भारत की संवैधानिक परम्परा में यह प्रावधान है कि यदि किसी प्रधानमंत्री की उसके कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो जाए और नया प्रधानमंत्री चुना जाना तत्काल सम्भव न हो तो कार्यवाहक अथवा अंतरिम प्रधानमंत्री की नियुक्ति तब तक के लिए की जा सकती है, जब तक की नया प्रधानमंत्री विधिक रूप से नियुक्त नहीं कर दिया जाता। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री के पद को रिक्त नहीं रखा जा सकता। कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पित गुलज़ारीलाल नंदा प्रथम बार पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद 1964 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए। दूसरी बार लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद 1966 में यह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। इनका कार्यकाल दोनों बार उसी समय तक सीमित रहा जब तक की कांग्रेस पार्टी ने अपने नए नेता का चयन नहीं कर लिया।

सियालकोट में हुआ जन्म

नंदाजी के रूप में विख्यात गुलज़ारीलाल नंदा का जन्म 4 जुलाई, 1898 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा है। इनके पिता का नाम ‘बुलाकी राम नंदा’ तथा माता का नाम ‘श्रीमती ईश्वर देवी नंदा’ था। नंदा की प्राथमिक शिक्षा सियालकोट में ही सम्पन्न हुई। इसके बाद उन्होंने लाहौर के ‘फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज’ तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। गुलज़ारीलाल नंदा ने कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की स्नातक उपाधि प्राप्त की। इनका विवाह 1916 में 18 वर्ष की उम्र में ही ‘लक्ष्मी देवी’ के साथ सम्पन्न हो गया था। इनके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री सम्मिलित हुए।

राजनीतिक जीवन रहा कुछ ऐसा

1921 में गुलजारी लालजी नंदा ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान 1932 में और भारत छोड़ो आंदोलन के समय 1942 से 1944 में इन्होंने जेल यात्रा भी की थी। वे मुंबई की कांग्रेस की ओर से विधानसभा में 1937 से 1939 तक और 1947 से 1950 तक विधायक रहे। 1947 में इंटक की स्थापना हुई और इसका श्रेय नंदाजी को जाता है। भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर भी ये 1950 से 1951, 1952 से 1953 और 1960 से 1963 में रहे। वे केंद्र में गृहमंत्री और श्रम व रोजगार मंत्री भी रहे।

दो बार रहे कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने

पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलालनेहरू के निधन के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में इनका प्रथम कार्यकाल 27 मई 1964 से 9 जून 1964 व लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद दूसरा कार्यकाल 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक रहा। ये अत्यंत ही अल्प समय के लिए प्रधानमंत्री बने थे। नंदा गांधीवादी विचारधारा के पोषक रहे और लोकतांत्रिक मूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी। वे धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी समाज की कल्पना करते थे। आप आजीवन गरीबों की सहायता के लिए मौजूद रहे।

राजनेता के साथ साथ एक सशक्त लेखक भी

नंदा साहब गांधीवादी, लोकतांत्रिक मूल्यों के हामी व एक राजनेता होने के साथ ही एक लेखक भी थे। लेखक के रूप में आपने सम ऑस्पेक्ट्स ऑफ खादी, अप्रोच टू द सेकंड फाइव ईयर प्लान, गुरु तेगबहादुर : संत एंड सेवियर, हिस्ट्री ऑफ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाइल्स, फॉर ए मौरल रिवोल्यूशन तथा सम बेसिक कंसीडरेशन आदि इन पुस्तकों की रचना की है।

पुरस्कार और सम्मान

1997 में गुलजारीलाल नंदा को देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारतरत्न’ और दूसरा सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान ‘पद्मविभूषण’ प्रदान किया गया था।

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