पुण्यतिथि विशेष- राजनीतिक,समाजिक और धार्मिक रूप देश को विकसित करने के लिए गोविंद रानाडे ने दिया अहम योगदान‌

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आज भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी, समाज सुधारक, विद्वान् और न्यायविद् महादेव गोविंद रानाडे की पुण्यतिथि है. रानाडे को ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता है। रानाडे ने अपने जीवन में समाज सुधार के लिए कई कार्य किए हैं। गोविंद रानाडे ‘दक्कन एजुकेशनल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना का भी समर्थन किया था और रानाडे स्वदेशी के समर्थक थे। महादेव गोविंद रानाडे को अपने सामाजिक कार्यों को पूरा करने में कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। वहीं ब्रिटिश सरकार उनके हर काम पर नजर रखती थी और परंपराओं को तोड़ने की वजह से वो जनता के भी कोप भाजन बने थे। सरकारी नौकरी में रहते हुए भी उन्होंने जनता से बराबर संपर्क बनाए रखा। दादाभाई नौरोजी के पथ प्रदर्शन में वे शिक्षित लोगों को देशहित के कार्यों की ओर प्रेरित करते रहे।

नाशिक में हुआ जन्म

महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म नाशिक के निफड तालुके में 18 जनवरी, 1842 को हुआ था। उन्होंने अपने बचपन का अधिकतर समय कोल्हापुर में गुजारा जहाँ उनके पिता मंत्री थे। 14 साल की अवस्था में उन्होंने बॉम्बे के एल्फिन्सटन कॉलेज से पढ़ाई प्रारंभ की। यह कॉलेज बॉम्बे विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था और महादेव गोविन्द रानाडे इसके प्रथम बी.ए. (1862) और प्रथम एल.एल.बी. (1866) बैच का हिस्सा थे। वे बी.ए. और एल.एल.बी. की कक्षा में प्रथम स्थान पर रहे। प्रसिद्ध समाज सुधारक और विद्वान आर.जी. भंडारकर उनके सहपाठी थे। बाद में रानाडे ने एम.ए. किया और एक बार फिर अपने कक्षा में प्रथम स्थान पर रहे।

वबाल विवाह के कट्टर विरोधी थे गोविंद रनाडे

देश के इस महान समाज सुधारक ने स्त्री शिक्षा का प्रचार किया। वे बाल विवाह के कट्टर विरोधी और विधवा विवाह के समर्थक थे। महादेव गोविंद रानाडे ने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना का समर्थन किया था और 1885 ई.के उसके प्रथम मुंबई अधिवेशन में भाग भी लिया। राजनीतिक सम्मेलनों के साथ सामाजिक सम्मेलनों के आयोजन का श्रेय उन्हीं को है। वे मानते थे कि मनुष्य की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रगति एक दूसरे पर आश्रित है। वे स्वदेशी के समर्थक थे और देश में निर्मित वस्तुओं के उपयोग पर बल देते थे। रानाडे ने विधवा पुनर्विवाह, मालगुजारी कानून, राजा राममोहन राय की जीवनी, मराठों का उत्कर्ष, धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आदि रचनाएं लिखी।

धार्मिक गतिविधियाँ

आत्माराम पांडुरंग, डॉ आर.जी. भंडारकर और वी.ए.मोदक के साथ उन्होंने ‘प्रार्थना समाज’ के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्राह्मो समाज से प्रेरित इस संगठन का उद्देश्य था वेदों पर आधारित एक प्रबुद्ध आस्थावाद का विकास। ‘प्रार्थना समाज’ के संस्थापक थे केशव चन्द्र सेन जिनका लक्ष्य था महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार लाना। महादेव गोविन्द रानाडे ने अपने मित्र वीरचंद गाँधी को सम्मानित करने के लिए एक सभा की अध्यक्षता की। वीरचंद गाँधी ने सन 1893 में शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ में हिन्दू धर्म और भारतीय सभ्यता का जोरदार पक्ष रखा था।

राजनैतिक गतिविधियाँ भूमिका 

महावेद गोविन्द रानाडे ने पूना सार्वजानिक सभा, अहमदनगर शिक्षा समिति और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले का गुरु माना जाता है तथा बाल गंगाधर तिलक के राजनीति और सोच का विरोधी भी माना जाता है।

सामाजिक गतिविधियाँ

रानाडे ने सोशल कांफ्रेंस मूवमेंट की स्थापना की और सामाजिक कुरीतियाँ जैसे बाल विवाह, विधवाओं का मुंडन, शादी-विवाह और समारोहों में जरुरत से ज्यादा खर्च और विदेश यात्रा के लिए जातिगत भेदभाव का पुरजोर विरोध किया। इसके साथ-साथ उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा पर भी बल दिया। वे ‘विधवा विवाह संगठन’ (जिसकी स्थापना सन 1861 में हुई थी) के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने भारत के इतिहास और सभ्यता को बहुत महत्व दिया पर उसके साथ-साथ उन्होंने भारत के विकास में ब्रिटिश शासन के प्रभाव को भी माना। उन्होंने लोगों से परिवर्तन को स्वीकारने को कहा और इस बात पर भी जोर दिया कि हमे अपनी परम्परावादी जाति व्यवस्था में भी बदलाव लाना चाहिए तभी हम भारत के महान सांस्कृतिक धरोहर को बाचा सकते हैं। रानाडे समाज और देश का सम्पूर्ण उत्थान चाहते थे।

धविश्वासों और कुरीतियों का जमकर विरोध किया

हालाँकि रानाडे ने अंधविश्वासों और कुरीतियों का जमकर विरोध किया पर अपने निजी जीवन में वे खुद रुढ़िवादी थे। जब उनकी पहली पत्नी का देहांत हुआ तब उनके सुधारवादी मित्रों ने ये उम्मीद की कि रानाडे किसी विधवा से विवाह करेंगे पर अपने परिवार के दबाव के चलते उन्होंने एक कम उम्र की लड़की (रमाबाई रानाडे) से विवाह किया। उन्होंने रमाबाई को पढाया-लिखाया और उनकी मृत्यु के बाद रमाबाई ने ही उनके सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों को आगे बढ़ाया। रमाबाई ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जब पुणे के एक सुधारवादी विष्णुपंत पंडित ने एक विधवा से विवाह किया तब उनके सम्मान में महादेव गोविन्द रानाडे ने उनका स्वागत अपने घर पर किया जिसके स्वरुप उनके रुढ़िवादी पिता नाराज़ होकर घर छोड़कर जाने लगे और जब रानाडे ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने की धमकी दी तब जाकर उन्होंने अपना मन बदला।

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