जयंती विशेष- तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,क्या गम है जिसे छुपा रहे हो : कैफी आजमी

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नर्म नाजुक शब्दों से सजे न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनसे कैफी आजमी की सौंधी महक आती है। संजीदा और सलीकेदार शायरी में मधुर गीत रचकर कैफी इस दुनिया से रुखसत हो गए। उनकी कलम से झरे खूबसूरत बोलों की रंगत, खुशबू और ताजगी आज भी वैसी ही है। कैफी की कलम का करिश्मा ही था कि वे ‘जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें’, जैसी कलात्मक रचना के साथ सहज मजाकिया ‘परमिट, परमिट, परमिट….परमिट के लिए मरमिट’ लिखकर संगीत रसिकों को गुदगुदा गए।

आजमगढ़ में हुआ जन्म

कैफी का असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। वे उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गांव मिजवान में सन 1915 में जन्मे। गांव के भोलेभाले माहौल में कविताएं पढ़ने का शौक लगा। भाइयों ने प्रोत्साहित किया तो खुद भी लिखने लगे। किशोर होते-होते मुशायरे में शामिल होने लगे। वर्ष 1936 में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली। धार्मिक रूढि़वादिता से परेशान कैफी को इस विचारधारा में जैसे सारी समस्याओं का हल मिल गया। उन्होंने निश्चय किया कि सामाजिक संदेश के लिए ही लेखनी का उपयोग करेंगे।

पहली ग़ज़ल 11 साल की उम्र में

कैफ़ी आज़मी ने अपनी पहली ग़ज़ल तब लिख दी थी, जब उनकी उम्र सिर्फ 11 साल की थी। इस ग़ज़ल का मिसरा था- ‘इतना तो ज़िंदगी में किसी की ख़लल पड़े’। कैफ़ी का असली नाम अतहर हुसैन रिज़वी था। उप्र में आज़मगढ़ जिले के गांव मिजवान में कैफ़ी का जन्म एक ज़मीदार ख़ानदान में हुआ। उनकी उम्र जब 19 बरस थी, तब वे कम्युनिस्ट पार्टी में शरीक हो गए। उन्होंने पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ के लिए लिखना शुरू किया और अपनी सलाहियतों के लिए एक बड़े कैनवास की तलाश में मुंबई पहुंच गए।

40 रुपए मिला महीना

देशभर के मुशायरों में जब एक नौजवान शायर के तौर पर कैफ़ी के नाम की धूम मच रही थी, उस वक्त वे कम्यूनिस्ट पार्टी मेंबर के रूप में मज़दूर और किसानों के हक़ की आवाज़ बुलंद कर रहे थे। पार्टी की तरफ से उन्हें 40 रुपए महीने का वज़ीफ़ा चुकाया जाता था। कैफ़ी इंडियन पीपुल थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के अखिल भारतीय अध्यक्ष और प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्ल्यूए) के एक्टिव मेंबर भी रहे।

यूं जुड़े फ़िल्मों से

उर्दू की मशहूर राइटर इस्मत चुग़ताई प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन के अहम सदस्यों में से एक थीं। उन्हें जब पता चला कि कैफ़ी साहब की बीवी शौकत उम्मीद से हैं, तो उन्होंने सोचा कि परिवार को कुछ ज़्यादा आमदनी की ज़रूरत है। इस्मत के शौहर शाहिद लतीफ उन दिनों बुज़दिल फ़िल्म बना रहे थे। इस्मत ने अपने शौहर से सिफ़ारिश की कि कैफ़ी से गीत लिखवाएं। शाहिद लतीफ कैफ़ी को गीत लिखने का मौका देने के लिए तो तैयार हो गए, मगर उन्होंने शर्त रखी कि इसका मेहनताना वे सीधे शौकत को देंगे। इस तरह कैफ़ी ने फ़िल्म के लिए पहला गीत लिखा- ‘रोते-रोते गुज़र गई रात’। और शौकत ने जिस सेहतमंद व ज़हीन बच्ची को जन्म दिया, वो बड़ी होकर शबाना आज़मी बनी।

कैफ़ी आज़मी के गीतों वाली कुछ फ़िल्में
शमा, काग़ज़ के फूल, शोला और शबनम, अनुपमा, आख़िरी ख़त, हक़ीक़त, हंसते ज़ख़्म, अर्थ वगैरह। ख़य्याम, जगजीतसिंह, रूपकुमार राठौर और चिंटू सिंह ने कई नज़्मों-ग़ज़लों को सुरों से सजाया है।

कैफ़ी आजमी के सदाबहार फ़िल्मी गीत

1. वक्त ने किया क्या हसीं सितम – काग़ज़ के फूल
2. जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें – शोला और शबनम
3. जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, खेल अधूरा छूटे न – शोला और शबनम
4. मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था – हक़ीक़त
5. कर चले हम फ़िदा जान-ओ तन साथियों -हक़ीक़त
6. तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है -हंसते ज़ख़्म
7. ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं – हीर-रांझा
8. मिलो न तुम तो हम घबराएं – हीर रांझा
9. तुम इतना जो मुस्करा रहे हो – अर्थ
10. कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है – अर्थ

कैफी आजमी को मिले कई अवॉर्ड

साल 1975 में कैफी आजमी को ‘आवारा सिज्दे’ किताब के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किये गये। साल 1970 में फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद 1975 में ‘गरम हवा’ फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ वार्ता फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

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