स्कूली बच्चों को छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति की दी जानी चाहिए प्राथमिक शिक्षा, तभी छत्तीसगढ़ का विकास संभव – कुलेश्वर ताम्रकार

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रायपुर (प्रखऱ)।छत्तीसगढ़ी बोली भाखा संस्कृति सुआ,ददरिया,पंथी,कर्मा,बिरो,बिल्लस,ठेठऱी,खुरमी और प्रदेश की महान विभूतयों के बारे में बच्चो को प्राथमिक शिक्षा दी जाए तभी छत्तीसगढ़ औऱ छत्तीसगढ़ी का विकास होगा- कुलेश्वर ताम्रकार
रायपुर (प्रखर)। छत्तीसगढ़ अपनी अनूठी लोक कला संस्कृति परम्परा की वजह से देश में एक अलग पहचान रखता हैं। सुआ,पंथी,ददरिया के साथ मांदर की ताल छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति को एक अलग ही स्तर में ले जाता हैं। लोककला को प्रदेश के जन-जन तक पहुंचाने का काम एक लोककलाकार का होता हैं। वह अपने रचना के माध्यम से अपने राज्य की कला संस्कृति खान-पान ठेठरी खुरमी,बरा,सोहारी से लेकर राउत नाचा,बास गीत,सरहुल,जस गीत का बखान करता हैं। अपनी रचना के माध्यम से अपने राज्य के नदी नाले अरपा पैरी की धारा खारून सोढूंर औऱ महानदी की महिमा को अपार बनता हैं। विकास के नाम पर हम बोरे-बासी,चिला,फरा बिरो,बिल्लस,डंडा पिचरंगा को भूलते जा रहे हैं। जिसे सहेज कर रखने काम एक लोककलाकार का होता हैं। ऐसे ही एक लोककलाकार हैं “कुलेश्वर ताम्रकार” जो बाल्यवस्था से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ की लोक कला को आगे बढ़ाने के लिए पथगामी बने हुए हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदेश की विलुप्त हो रही लोक कला को सहेज कर रखने का प्रयास कर रहे हैं। “सोनहाबिहान” से लेकर “लोकरंग अरजुंदा” जैसे मंच के जरिए छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी बोली भाखा को आगे बढ़ाने का काम कुलेश्वर ताम्रकार ने किया हैं। इसी कड़ी में प्रखर समाचार ने उनसे छत्तीसगढ़ी लोककला संस्कृति परम्परा से लेकर छत्तीसगढ़ी सिनेमा और छत्तीसगढ़ी बोली भाखा के वर्तमान दशा के संबंध में बातचीत की,बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं।

सवाल – छत्तींसगढ़ी कला संस्कृति की वर्तमान दशा के बारें मे आपके क्या विचार हैं ?

जवाब – देश मे छत्तीसगढ़ की पहचान एक अनुठी कला संस्कृति को अपने अंतस में संजोकर रखने वाले राज्य के रुप में है। यहाँ कि कला संस्कृति,खेल,मेवा मिष्ठान,बोली भाखा अनुपम और अनूठा है। लेकिन वर्तमान समय की बात करें तो यहाँ कि कला संस्कृति कि दशा बेहद नाजुक स्थिती में हैं। प्रदेश कि कुछ परंपरा विलुप्त हो चुकी है और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। प्रदेश की नई पीढ़ियों द्वारा अपने माटी की कला संस्कृति को कुछ खास महत्व नहीं दिया जा रहा है। जिसके चलते छत्तीसगढ़ महतारी की बोली भाषा अपने ही राज्य में उपेक्षित हो रही है । इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हम लोग ही हैं अगर हम अपनी कला संस्कृति को अच्छे से सहेज कर नहीं रखेंगे। अपने बच्चों को सुआ,पंथी,ददरिया,कर्मा फुगड़ी,बिल्लस,बिरो,डंडा पचरंगा,गुल्ली डंडा के बारे में नहीं बताएंगे तो उन्हें कैसे पता चलेगा। वो कैसे अपने आने वाले पीढ़ी को प्रदेश की इस अनूठी परंपरा को हस्तांतरित करेंगे। वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने की जरूरत है इसका भरपूर प्रचार प्रसार करने की आवश्यकता है।‌

सवाल – छत्तीसगढ़ी बोली भाखा आपके लिए कितना महत्व रखता हैं ?

जवाब – छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी मेरे अंतस में समायी हैं।‌ इसके बगैर मैं अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। यह मेरी महतारी के दूध की भाखा है,छत्तीसगढ़ के लाखों लोगों की भाषा है यह सिर्फ भाषा नहीं बल्कि हमारे अंतस की पुकार है। जिसे एक छत्तीसगढ़िया व्यक्ति ही समझ सकता है। छत्तीसगढ़ी बोला भाखा मेरे लिए उतनी ही अहमियत रखता हैं। जितना एक शिशु के लिए माता,जीवन के आक्सीजन और शरीर के लिए आत्मा की महत्ता हैं।

सवाल – लोक कलाकार और फिल्म कलाकार में क्या अंतर हैं ?

जवाब – ज्यादातर लोग लोक कलाकार और फिल्म कलाकार को एक समझते हैं। इन दोनों में सैद्धांतिक अंतर होता है। फिल्म कलाकार लोक कलाकार से अलग होते हैं। वह एक बनी बनाई स्टोरी पर वर्क करता है,विभिन्न प्रकार के फीचर्स,एनिमेशन,ग्राफिक्स डबिंग और स्पेशल इफेक्ट के जरिए अपने अभिनय को प्रभावी बनाता है। ऑटो ट्यून डबिंग इत्यादि के द्वारा आवाज को आकर्षक बनाता है। किसी सीन को करने के लिए मनचाहे रिटेक लेता हैं। जबकि लोक कलाकार फिल्मकार की तुलना में अलग होते हैं। वह ऑटो ट्यून,डबिंग,एनिमेशन,ग्राफिक्स,रिटेक वगैरह का इस्तेमाल किए बिना केवल अपने अभिनय के दम पर अपने पात्र को जीवित और प्रभावी बनाता है। लोक कलाकार क्षेत्र विशेष की लोक कला से ओतप्रोत होती हैं । लोक कलाकार ज्यादा से ज्यादा संबंधित जगहों के आस पास की लोक कहानियां को अपने कला में पिरोने का काम करता है। क्षेत्र विशेष की पारंपरिक कला संस्कृति के हिसाब से अपनी रचना का निर्माण करता है। लोक कलाकार का उद्देश्य पैसा कमाना ना होकर अपनी कला संस्कृति को आगे बढ़ाना होता हैं।

सवाल – छत्तीसगढ़ी सिनेमा की वर्तमान स्थिती के बारे में आपके क्या विचार हैं ?

जवाब – छत्तीसगढ़ी सिनेमा पहले की तुलना में काफी बड़ी हो गई है। धीरे धीरे पुष्पित और पल्लवित हो रही है। “कही देबे संदेश” से लेकर “हस झन पगली पगली फस जबे” तक का लंबा सफर छत्तीसगढ़ी सिनेमा ने तय किया है। छत्तीसगढ़ फिल्म के ऊपर कभी-कभी बंबईया छाप फिल्में बनाना के आरोप लगे हैं। अपनी कला संस्कृति को दिखाने के बजाय पाश्चात्य संस्कृति को दिखाने की बात भी लोगों ने कही है। जिसकी झलक छत्तीसगढ़ की कुछ फिल्में में देखने को भी मिलती हैं। छत्तीसगढ़िया फिल्मों में सुआ,ददरिया,करमा के बजाय पॉपसॉन्ग,आइटम सॉन्ग और पाश्चात्य संस्कृति की झलक देखने को मिलती हैं। जो छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को आगे बढ़ाने की दृष्टी से छत्तीसगढ़ सिनेमा के लिए नुकसानदेह हैं।

सवाल – क्या वजह हैं आजकल‌ के युवा छत्तीसगढ़ी बोली का प्रयोग सार्वजनिक स्थलों में करने के लिए कतराते हैं ?

जवाब – दुनिया के हर एक देश में रहने वाले लोगों को अपनी माटी से विशेष लगाव रहता है।‌फर्क सिर्फ इतना है कि कई लोग दिखाते हैं और कई लोग छुपाते हैं।‌ बात रही छत्तीसगढ़ी बोली भाखा का प्रयोग सार्वजनिक स्थलों पर आजकल के युवा द्वारा नहीं करने का,तो उसके लिए वह युवा जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए उनके माता-पिता जिम्मेदार है जिन्होंने दूसरी भाषा को ज्यादा महत्व देते हुए अपने महतारी की भाषा छत्तीसगढ़ी अपने बच्चों को नहीं सिखायी। मैं मानता हूं की अंग्रेजी हिंदी का प्रयोग करना चाहिए।‌ मैं किसी भी भाषा का विरोध नहीं करता लेकिन हम जिस राज्य में रहते हैं उस राज्य की बोली भाषा का हमें सम्मान करना चाहिए। उसका भरपूर प्रयोग करना चाहिए। जब हम उसका भरपूर प्रयोग करेंगे तभी सामने वाला व्यक्ति हमसे प्रभावित होगा और हमारी छत्तीसगढ़ी बोली भाषा को बोलने का प्रयास करेगा। जब तक हम स्वयं अपनी भाषा प्रचार प्रसार नहीं करेंगे उसका सम्मान नहीं करेंगे तो छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति का विकास नहीं होगा। इसके लिए सरकार को विशेष रुप से ध्यान देना चाहिए। छत्तीसगढ़ी को भाषा को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए। प्राथमिक स्तर से स्कूली बच्चों को छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति की शिक्षा दी जानी चाहिए। यहां के व्यंजन खुरमी ठेठरी बरा सोहारी के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। खो खो,कबड्डी,फुगड़ी,बिरो,बिल्लस डंडापिचरंगा,गुली डंडा के बारे में बताना चाहिए तभी हमारी छत्तीसगढ़ी संस्कृति का विकास हो पाएगा।

सवाल – रंगमंच और फिल्म में क्या अंतर हैं ?

जवाब – रंगमंच और फिल्म दोनो ही मनोरंजन का मुख्य साधन है। दोनों अपनी अपनी कहानी के दम पर दर्शको को मनोरंजित करते हैं।‌ फिल्म को परफॉर्म करने के लिए ज्यादा प्लेफॉर्म मिलती है जबकि थिएटर को सीमित प्लेटफार्म मिलता है।‌ फिल्म के कलाकारों को अपने पात्र को आकर्षक बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की आधुनिक सुविधाएं जैसे डबिंग,रिटेक,ग्राफिक,एनीमेशन मिलता हैं,जबकि रंगमंच के कलाकार सीधे मंच पर परफॉर्म करते हैं। उनको अपने पात्र को अपने-अपने के दम पर रचनात्मक जीवित बनाना होता है। थिएटर और फिल्म दोनों में ही एक कलाकार का परफॉरमेंस बहुत मायने रखते हैं। उसी के हिसाब से दर्शक किसी कहानी से जुड़ पाते हैं।

सवाल – छत्तीसगढ़ के लोग आपको एक ठेठ छत्तीसगढ़ी कलाकार के रूप में पसंद करते हैं,तो आपको कैसा लगता है ?

जवाब – मेरे लिए यह सम्मान की बात है कि मुझे लोग मेरे नाम से नहीं बल्कि मेरे काम से जानते हैं।‌ छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा करते हुए मुझे यह सम्मान प्राप्त हुआ हैं। मैं काफी सौभाग्यशाली हूं कि मुझे अपनी माटी की सेवा करने के लिए जाना जाता है छत्तीसगढ़ी लोक कला को आगे बढ़ाने के लिए पहचाना जाता है

सवाल – छत्तीसगढ़ी गाने लिखने और गाने की प्रेरणा कहां से मिली ?

जवाब – बचपन से ही छत्तीसगढ़ी लोक कला गीत संगीत की ओर मेरी विशेष सूची थी। स्कुल के टाइम में जब भी कोई गाना गाने और बजाने की बात होती तो मेरे शिक्षक सबसे पहले मेरा ही नाम लेते और मुझसे गाना गवाते। बाल्यकाल‌ में ट्रैक्टर‌ की ट्राली में चढ़के गाने गाये हैं। टिकिया डबल रोटी के बदले बचपन में कई बार गाने गाये। मैंने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली। मेरे पिता एक पुलिसकर्मी होने के साथ-साथ अच्छे खासे लोक कलाकार भी थे। जिनसे मैं काफी हद तक प्रभावित था। बचपन से उन्हें गाते बजाते देख लोक कला के प्रति मेरे रुचि बढ़ती गई।जब पिताजी का देहांत हुआ तब लोक कला के जरिए मैंने अपना पेट पालना शुरू किया।

सवाल – लोककला और लोक कलाकार को बढ़ावा देने के‌ लिए राज्य सरकार को क्या प्रयास करना चाहिए ?

जवाब – लोक कला और लोक कलाकार एक दूसरे के पूरक हैं। लोक कला को अपनी कलाकारी के दम पर देश से लेकर विदेश तक पहुंचाने का काम लोक कलाकार करता है।‌ लोक कलाकार लोक कला का प्रचारक होता है। अतः लोक कला को बढ़ावा देने के लिए लोक कला के प्रचारक यानी लोक कलाकारों के लिए राज्य सरकार को प्राथमिक स्तर पर आचार संहिता का निर्माण करना चाहिए। कला क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें समय-समय पर सम्मानित करना चाहिए। पीएम आवास सीएम आवास के जैसे लोक कलाकार के लिए भी आवास का निर्माण करवाना चाहिए क्योंकि अगर लोग कलाकार आर्थिक सामाजिक रूप से संपन्न होगा तो लोक कला को वो उतने ही उमंग और उत्साह के साथ आगे बढ़ाएगा।

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