अफसरों और ठेकेदारों की सांठगांठ तोड़ रही किसानों की कमर, पैक हाउस के नाम पर पकड़ा रहे टिन का डब्बा

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रायपुर(प्रखर)। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय बागवानी मिशन की शुरुआत वर्ष 2005-06 में किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए दसवी पंचवर्षीय योजना के रूप में की गयी थी। इस योजना का उद्देश्य भारत में बागवानी क्षेत्र में वृद्धि तथा बागवानी उत्पादन को बढ़ाना है। किसानों के हितों एवं बागवानी उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरु हुई यह योजना अब भ्रष्टाचार का शिकार हो गयी है। छत्तीसगढ़ में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां इस योजना के तहत ठेकेदार सस्ती से सस्ती क्वालिटी के पैक हाउस का निर्माण करवाता है और शासन द्वारा किसानों को मिली पूरी राशि स्वंय ही लेकर चला जाता है।

ऐसे ही भ्रष्टाचार का शिकार हुए किसान से हमारी मुलाकात हुई और उसने जो जानकारी दी वह चौकाने वाले थे। ठेकेदार ने नीली शीट वाले जो पैक हाउस बनाकर किसानों को दिए हैं वह भी अधूरे हैं। ग्राम धरसींवा के रहने वाले किसान का ने बताया कि बेस पर कोई काम नहीं किया गया और यह टीने का शे़ड तैयार कर दिया गया, जो किसी काम का नहीं है।

किसान ने बताया कि पहले तो विभाग द्वारा पैक हाउस बनाने से इनकार किया गया। लेकिन एक दिन उनका फोन आया और उन्होंने कुछ सामान लाने को कहा। मैं ट्रैक्टर लेकर गया और उनका बताया सारा सामान भी लेकर आया। जिसके बाद मैने उन्हें सूचना दी। ठेकेदार आए और उन्होंने ये शेड तैयार कर के दे दिया। किसान ने उन्हें यह भी बताया कि ठेकेदार द्वारा उनसे दो लाख का ब्लैंक चेक भी लिया गया था। जिसके कुछ दिन बाद ही मेरे खाते से दो लाख रूपये कट गये। यह वही दो लाख रूपये थे जो विभाग के द्वारा मेरे अकाउंट में भेजे गए थे।

4 लाख की लागत में 2 लाख मिलनी है सब्सिडी
दरअसल इस योजना के तहत किसानों को 9मीटरx6 मीटर के पैक हाउस निर्माण के लिए 4 लाख रुपये खर्च करने होते हैं। जिसके बाद भौतिक सत्यापन कर सरकार की तरफ से 50 प्रतिशत अनुदान के रूप में 2 लाख रुपये की राशि किसानों के खाते में ट्रांसफर की जाती है लेकिन इस योजना में बंदरबांट इस कदर हावी है कि जो काम सबसे आखिरी में होना चाहिए वही सबसे पहले किया जा रहा है।

राज्य में कौन करवाता है पैक हाउस का निर्माण?
राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों को पैक हाउसेस का निर्माण करवाया जा रहा है। राज्य में पैक हाउस निर्माण के लिए 29 करोड़ का बजट प्रावधान में है। जिसके निर्माण के लिए राज्य में दो डिपार्टमेंट काम कर रहे हैं। पहला है नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन (NHM) और दूसरा है राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)। एनएचम को 17 करोड़ की लागत से राज्य के 18 जिलों में 880 पैक हाउस तथा अन्य जिलों में आरकेवीवाय द्वारा 12 करोड़ की लागत से 600 पैक हाउस के निर्माण करवाए जाने का प्रावधान है।

सबसे पहले समझिए पैक हाउस क्या है ?
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत राज्य में उद्यानिकी विभाग की तरफ से किसानों को बागवानी के लिए पैक हाउस योजना का लाभ दिया जा रहा है। पैक हाउस बनवाने के लिए किसान के पास कम से कम 1 हेक्टेयर खेत होना चाहिए। जहां किसान सब्जी उगाने की तैयारी और इसे नर्सरी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जिसे नियमानुसार पक्का निर्माण करके दिया जाना चाहिए। कई मामलों में यह नीले रंग के टिन से भी निर्मित होते हैं।

योजना के तहत पहले निर्माण फिर खाते में राशि
किसान को पैक हाउस योजना का लाभ लेने के लिए विभाग को सूचना देकर अपने खेत में मिट्टी, गिट्टी और अन्य निर्माण कार्य सहित जमीन को समतल कर निर्माण कार्य पूरा करना होता है। जिसके बाद इंजीनियर इसे सत्यापित कर विभाग को बिल पेश करता है। किसान की तरफ से निर्माण पूरा होने के बाद 4 लाख का बिल दर्शाने के बाद उद्यानिकी विभाग के फील्ड ऑफिसर पैक हाउस का भौतिक सत्यापन करते हैं। सब कुछ ठीक होने पर किसान की खर्च की गई राशि का 50 प्रतिशत यानि 2 लाख रुपये की राशि सरकार की तरफ से अनुदान के तौर पर सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है।

भ्रष्ट अफसरों ने बदला योजना का स्वरूप
योजना का उद्देश्य ये है कि किसान अपने खेत में सब्जी की बेहतर पैदावार के लिए नर्सरी की जरूरतों को पूरा कर सकें, लेकिन उद्यानिकी विभाग के अधिकारी। ठेकेदारों से सांठगांठ कर अपने मनमुताबिक योजना चला रहे हैं। सरकार की आंखों में धूल झोंककर उद्यानिकी विभाग के अफसर पैक निर्माण से पहले ही 2 लाख रुपये किसानों के खाते में ट्रांसफर करते हैं। जिसके बाद ठेकेदारों को विभाग से संबंधित किसानों की सूची मिल जाती है और ठेकेदार किसानों के पास पैक हाउस निर्माण के लिए पहुंच जाते हैं। भोले-भाले किसान भी खाते में पैक हाउस के नाम से आई पूरी राशि निकाल कर ठेकेदार को दे देते हैं। ठेकेदार अपने मन मुताबिक पैक हाउस बना कर खड़ा कर देते हैं।

कैसे होता है पूरा गोलमाल ?
पैक हाउस योजना का लाभ पाने के लिए अफसर एक सुनियोजित रैकेट चला रहे हैं, जिसके तहत सबसे पहले किसानों से संपर्क कर उनसे सभी जरूरी कागजात एकत्र किए जाते हैं। प्रकरण तैयार किया जाता है और सरकार की आंखों में धूल झोंककर सबसे पहले 2 लाख रुपये की राशि किसान के खाते में हस्तांतरित कर दी जाती है। जैसे ही राशि किसान के खाते में जाती है, इसके बाद ठेकेदार की भूमिका यहां से शुरू हो जाती है। ठेकेदार किसानों के पते पर पहुंचते हैं और राशि लेकर मापदंडों को दरकिनार कर जैसे-तैसे एक नीले रंग की लोहे की पतली चादर वाला ढांचा खड़ा कर किसानों को सौंप देते है।

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