पुण्यतिथि विशेष : मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक,मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक – माखनलाल चतुर्वेदी

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साहित्य और पत्रकारिता को ज्यादातर लोग एक मानते हैं। क्योकि दोनो ही क्षेत्र में शब्द और लेखनी का उतना ही महत्व होता जितना भुखे के लिए अन्न का एक निवाला और किसी रिश्ते के लिए विश्वास का होता हैं। साहित्य और पत्रकारिता दो अलग-अलग चीजे हैं। दोनो की लेखन शैली, भाषा भाव, संदेश और अभिव्यक्ति अलग-अलग होती हैं। देश में कुछ विभूतियां ऐसे भी हैं,जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता दोनो  ही क्षेत्र में अविस्मरणीय तरीके से काम किया। लेखन की दो अलग- अलग माध्यमों को अपने दो हाथ बनाए औऱ निरंतर सामांजस्य बनाकर पत्रकारिता और साहित्य दोनो में अपना अहम योगदान दिया। ऐसी ही शख्सियत थे, ‘’एक भारतीय आत्मा’’ के नाम से मशहूर साहित्यकार और पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी। जिन्होंने पत्रकारिता जगत को नई दिशा तो दी,साथ ही साहित्य हिंदी साहित्य को कई अद्भुत कविताएं भी प्रदान की। उनकी कविता साहित्य जगत में इतनी लोकप्रिय हुई कि उन्हें देश ने ’एक भारतीय आत्मा’ की उपमा प्रदान की। इनकी भाषा ओजपूर्ण,सरल,सहज और स्पष्ट रही जिसमें सदैव प्रेरणा का स्वर समाहित रहता था।

मध्य प्रदेश के बावई में हुआ जन्म

हिंदी साहित्य जगत् के कवि, लेखक, पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 ई. में बावई, मध्य प्रदेश में हुआ था। बचपन में वह काफ़ी रूग्ण और बीमार रहा करते थे। चतुर्वेदी जी के जीवनीकार बसआ का कहना है ‘दैन्य और दारिद्रय की जो भी काली परछाई चतुर्वेदियों के परिवार पर जिस रूप में भी रही हो, माखनलाल पौरुषवान सौभाग्य का लाक्षणिक शकुन ही बनता गया। इनका परिवार राधावल्लभ सम्प्रदाय का अनुयायी था,इसलिए संभवत:चतुर्वेदी के व्यक्तित्व में वैष्णव पद कण्ठस्थ हो गये। प्राथमिक शिक्षा की समाप्ति के बाद ये घर पर ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे। इनका विवाह पन्द्रह वर्ष की अवस्था में हुआ और उसके एक वर्ष बाद आठ रुपये मासिक वेतन पर इन्होंने अध्यापन कार्य शुरू किया।

 प्रभा से लेकर कर्मवीर जैसे पत्रिका का किया संपादन

सन 1913 में माखनलाल चतुर्वेदी  ने प्रभा पत्रिका का सम्पादन आरम्भ किया, जो पहले चित्रशाला प्रेस, पूना से और बाद में प्रताप प्रेस, कानपुर से छपती रही। प्रभा के सम्पादन काल में इनका परिचय गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ, जिनके देश- प्रेम और सेवाव्रत का इनके ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। चतुर्वेदी ने 1918 ई. में ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नामक नाटक की रचना की और 1919 ई. में जबलपुर से ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन किया। यह 12 मई, 1921 ई. को राजद्रोह में गिरफ़्तार हुए 1922 ई. में कारागार से मुक्ति मिली। चतुर्वेदी जी ने 1924 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ़्तारी के बाद ‘प्रताप’ का सम्पादकीय कार्य- भार संभाला। यह 1927 ई. में भरतपुर में सम्पादक सम्मेलन के अध्यक्ष बने और 1943 ई. में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष हुए। इसके एक वर्ष पूर्व ही ‘हिमकिरीटिनी’ और ‘साहित्य देवता’ प्रकाश में आये। इनके 1948 ई. में ‘हिम तरंगिनी’ और 1952 ई. में ‘माता’ काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुए।

साहित्यकार के रुप में तय की लंबी यात्रा

माखनलाल चतुर्वेदी ने एक रचनाकार के रुप में हिंदी साहित्य जगत में एक लंबा सफर तय किया । उनकी नि:स्वार्थ साहित्य साधना और विविध विषयक गीत सन् 1904  से ही काव्य-प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय होने लगे थे। लेकिन 1942 में जब उनकी पहली काव्य संग्रह ‘हिमतरंगिणी’ प्रकाशित हुई। इस काव्य संग्रह ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए और वे हिंदी काव्य जगत के सबसे प्रभावी और सशक्त कवि बनकर उभरें। 1957 में ‘माता’ नाम नाम की एक अन्य काव्य पुस्तक प्रकाशित हुई जिसे फिर से काफी सराहा गया। इसके बाद युग चरण,समर्पण और वेणु लो गूँजधरा 1960  में प्रकाशित हुई । बाद में गद्य गीतों का संग्रह ‘साहित्य देवता’ और निबंध तथा चंद कहानियां ‘अमीर इरादे-गरीब इरादे’ के नाम से प्रकाश में आए। उन्होंने ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ के नाम से एक नाटक भी लिखा था। जिसके प्रति आलोचको ने उदासीनता दिखाई थी। उनके इस कदम से जाहिर है,कि माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘एक भारतीय आत्मा’ कहलाने के नाते अपने लिए नवीन पथ-रेखा तलाशी ली थी। 1914 में जब उनकी पत्नी का असामयिक त्रासद निधन हुआ था,तो अश्रुपात करते हुए माखनलाल ने  “भाई छेड़ो नहीं मुझे खुलकर रोने दो,यह पत्थर का हृदय आसुंओं से धोने दो की रचना की । इस रचना के माध्यम से उन्होंने अर्धागिनी के प्रति अपना अगाध प्रेम दिखाया था।

रचनाओं में भांति-भांति के भावो का अद्भुत समावेश देखने को मिलता था  

हिन्दी काव्य के विद्यार्थी माखनलाल जी की कविताएँ पढ़कर सहसा आश्चर्य चकित रह जाते है। उनकी कविताओं में कहीं ज्वालामुखी की तरह धधकता हुआ अंतर्मन, जो विषमता की समूची अग्नि सीने में दबाये फूटने के लिए मचल रहा है, कहीं विराट पौरुष की हुंकार, कहीं करुणा की अजीब दर्द भरी मनुहार। वे जब आक्रोश से उद्दीप्त होते हैं तो प्रलयंकर का रूप धारण कर लेते हैं किंतु दूसरे ही क्षण वे अपनी कातरता से विह्वल होकर मनमोहन की टेर लगाने लगते हैं। चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व में संक्रमणकालीन भारतीय समाज की सारी विरोधी अथवा विरोधी जैसी प्रतीत होने वाली विशिष्टताओं का सम्पुंजन दिखायी पड़ता है।

पुरस्कार और सम्मान

सन 1943 में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा ‘देव पुरस्कार’ माखनलाल को ‘हिम किरीटिनी’ पर दिया गया था। 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार की स्थापना होने पर हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार ‘हिमतरंगिनी’ के लिए उन्हें प्रदान किया गया। ‘पुष्प की अभिलाषा’ और ‘अमर राष्ट्र’ जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने 1959 में उन्हे डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। 1963 में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया। 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलाल ने यह अलंकरण लौटा दिया था । 16 से 17 जनवरी 1965 को मध्यप्रदेश शासन की ओर से खंडवा में ‘एक भारतीय आत्मा’ माखनलाल चतुर्वेदी के लिए नागरिक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। तत्कालीन राज्यपाल हरि विनायक पाटसकर और मुख्यमंत्री पं॰ द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा हिन्दी के अग्रगण्य साहित्यकार-पत्रकार इस गरिमामय समारोह में उपस्थित थे। भोपाल का माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है।

माखनलाल चतुर्वेदी की प्रमुख कृतियां

हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, बीजुरी काजल आँज,कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पांव, अमीर इरादे गरीब इरादे।

 

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