पुण्यतिथि विशेष बाबा आम्टे – भारतीय समाज में अछूत की दृष्टी से देखे जाने वाले कुष्ठरोगियों को दिल से लगाने वाले एकलौते शख्सियत थे,बाबा आमटे

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दुनिया में कुछ लोग ऐसा कर जातें है,जो हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं। हम ऐसी ही एक शख्सियत के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन कुष्ठमरोगियों और जरूरतमंदों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उस शख्सियत का नाम बाबा आम्टे है,इन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपनी अहम भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश सरकार की सत्ता को हिलाने से लेकर कुष्ठ रोगियों को राहत दिलाने में बाबा आम्टे ने महत्वपूर्ण योगदान दिया । उन्होंने उस दौर में कुष्ठ रोग के बारें में खुलकर बोला। जिस दौर में इस रोग का नाम सार्वजनिक स्थल के बजाय गुप्त जगहो में लेने से भी लोग शर्माते थे। उस दौर में बाबा आम्टे ने न सिर्फ कुष्ठ रोग के बारें मे बोला बल्कि इस रोग से पीड़ित लोगो को राहत दिलाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महाराष्ट्र में हुआ जन्म

विख्यात समाजसेवक बाबा आम्टे का जन्म 24 दिसंबर, 1914 ई. को वर्धा महाराष्ट्र के निकट एक ब्राह्मण जागीरदार परिवार में हुआ था। पिता देवीदास हरबाजी आम्टे शासकीय सेवा में थे। उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता। वे सोने के पालने में सोते थे और चांदी की चम्मच से उन्हें खाना खिलाया जाता था। बाबा आम्टे को बचपन में माता-पिता ‘बाबा’ पुकारते थे। इसलिए बाद में भी वे बाबा आम्टे के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाबा आम्टे के मन में सबके प्रति समान व्यवहार और सेवा की भावना बचपन से ही थी। बाबा आम्टे का विवाह भी एक सेवा-धर्मी युवती साधना से विचित्र परिस्थितियों में हुआ। बाबा आम्टे को दो संतान प्राप्त हुई प्रकाश आम्टे, एवं विकास आम्टे। 9 फरवरी, 2008 को 94 साल की आयु में चन्द्रपुर ज़िले के वड़ोरा स्थित अपने निवास में बाबा आम्टे का निधन हो गया।

शिक्षा

बाबा आमटे ने एमए.एलएलबी तक की पढ़ाई संपन्न की। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा क्रिस्चियन मिशन स्कूल नागपुर से पूरी की। इसके बाद वे नागपुर यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई करने लगे। इसी दौरान उन्होंने कई दिनों तक वकालत की । बाबा आमटे ने अपने पैतृक शहर में भी वकालत की थी जो कि काफी सफल रही। वकालत के दौरान अनेक स्वतंत्रता सेनानी उनके पास आया जाया करते थे।जिनका असर धीरे धीरे बाबा आम्टे के मस्तिष्क में होने लगा। उनके अंदर की राष्ट्र भावना धीरे-धीरे प्रगाढ़ होती जा रही थी।

बाबा आम्टे आजादी से पहले

बाबा आम्टे ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक वकील के तौर पर की। वकील के रूप में वह बेहद सफल भी रहे लेकिन गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन ने उनकी जिंदगी बदल दी. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वह भी जेल गए। उन्‍होंने कई गिरफ्तार हुए नेताओं के मुकदमे लड़ने के लिए अपने साथी वकीलों को संगठित किया। उनके इन्‍हीं प्रयासों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन वरोरा में कीड़ों से भरे कुष्‍ठ रोगी को देखकर उनके जीवन की धारा बदल गई। उन्‍होंने अपना वकालती चोगा और सुख-सुविधा वाली जीवन शैली त्‍यागकर कुष्‍ठ रोगियों और दलितों के बीच उनके कल्‍याण के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया।

महात्मा गांधी और विनोबा भावे से थे प्रभावित

बाबा आमटे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी और विनोबा भावे से प्रभावित थे। उन्होंने ने इनके साथ मिलकर पूरे भारत का दौरा किया। देश के गांवों मे अभावों में जीने वालें लोगों की असली समस्याओं को समझने की कोशिश की। उन्होनें देश के स्वतंत्रता संग्राम में खुलकर भाग लिया। बाबा आम्टे ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में होने वाले बड़े आंदोलनों में भाग लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 8 अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ था। इस आन्दोलन के दौरान बाबा आमटे ने पूरे भारत में बंद लीडरों का केस लड़ने के लिए वकीलों को संगठित किया था।

कुष्ठ रोगियों के मसीहा थे बाबा आमटे

भारत में विनोबा भावे, मदर टेरेसा, महात्मा गांधी की तरह ही बाबा आमटे ने भी प्राणि मात्र में बसे नारायण की सेवा अपने आचरण में समाहित कर इतनी ख्याति प्राप्त की। वे एक बेहद संपन्न घराने से ताल्लुक रखते थे। जिंदगी के सारे ऐशो-आराम छोड़ गरीबों, दुखियों और कुष्ठ रोगियों की जिंदगी संवारने में उन्होंने अपना सारा जीवन लगा दिया। इतने उच्च कार्य की वजह से ही बाबा आमटे की जीवनी को लोग आदर्श मानते हैं और उनके मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। जिन कुष्ठ रोगियों को भारतीय समाज में अछूत की निगाहों से देखा जाता है उन्हें बाबा आमटे ने दिल से लगाया।

समाज सुधार

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए। नेताओं के मुकदमें लड़ने के लिए उन्‍होंने अपने साथी वकीलों को संगठित किया और इन्‍ही प्रयासों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्‍हे गिरफ्तार कर लिया, लेकिन वरोरा में कीड़ों से भरे कुष्‍ठ रोगी को देखकर उनके जीवन की धारा बदल गई। उन्‍होंने अपना वकालती चोगा और सुख-सुविधा वाली जीवन शैली त्‍यागकर कुष्‍ठरोगियों और दलितों के बीच उनके कल्‍याण के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया।

आनंद वन की स्‍थापना

बाबा आम्टे ने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की सेवा और सहायता का काम अपने हाथ में लिया। कुष्ठ रोगियों के लिए बाबा आम्टे ने सर्वप्रथम ग्यारह साप्ताहिक औषधालय स्थापित किए, फिर ‘आनंदवन’ नामक संस्था की स्थापना की। उन्होंने कुष्ठ की चिकित्सा का प्रशिक्षण तो लिया ही, अपने शरीर पर कुष्ठ निरोधी औषधियों का परीक्षण भी किया। 1951 में ‘आनंदवन’ की रजिस्ट्री हुई। सरकार से इस कार्य के विस्तार के लिए भूमि मिली। बाबा आम्टे के प्रयत्न से दो अस्पताल बने, विश्वविद्यालय स्थापित हुआ, एक अनाथालय खोला गया, नेत्रहीनों के लिए स्कूल बना और तकनीकी शिक्षा की भी व्यवस्था हुई। ‘आनंदवन’ आश्रम अब पूरी तरह आत्मनिर्भर है और लगभग पाँच हज़ार व्यक्ति उससे आजीविका चला रहे हैं।

भारत जोड़ो आंदोलन

बाबा आम्‍टे ने राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए 1985 में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और 1988 में असम से गुजरात तक दो बार भारत जोड़ो आंदोलन चलाया। नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बांध निर्माण और इसके फलस्‍वरूप हजारों आदिवासियों के विस्‍थापन का विरोध करने के लिए 1989 में बाबा आम्‍टे ने बांध बनने से डूब जाने वाले क्षेत्र में निजी बल (आंतरिक बल) नामक एक छोटा आश्रम बनाया।

पुरस्कार और सम्मान 

बाबा आम्टे को उनके इन महान् कामों के लिए बहुत सारे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। उन्हें मैगसेसे अवॉर्ड, पद्मश्री, पद्मविभूषण, बिड़ला पुरस्कार, मानवीय हक पुरस्कार, महात्मा गांधी पुरस्कार के साथ-साथ और भी कई पुरस्कारों से नवाजा गया।

1971 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री

1978 में राष्‍ट्रीय भूषण

1983 में अमेरिका का डेमियन डट्टन पुरस्कार

1985 में मैग्‍सेसे पुरस्‍कार

1986 में पद्म विभूषण

1988 में घनश्यामदास बिड़ला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

1988 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मान

1990 में अमेरिकी टेम्पलटन पुरस्कार

1991 में ग्लोबल 500 संयुक्त राष्ट्र सम्मान

1992 में राइट लाइवलीहुड सम्मान

1999 में गाँधी शांति पुरस्कार

2004 में महाराष्ट्र भूषण सम्मान

 

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