पुण्यतिथि विशेष गिरिराज किशोर – हिंदी साहित्य जगत में सामयिक विषयों में विचारोत्तेजक निबंध लिखने वाले अनूठे साहित्यकार थे गिरिराज किशोर

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गिरिराज किशोर हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार होने के साथ-साथ एक सशक्त कथाकार, नाटककार और आलोचक थे। एक कहानीकार के रूप में भी इन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित की। गिरिराज किशोर के सम-सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित होते रहे। उन्होने बालकों के लिए भी अनेक लेख लिखे। इनका उपन्यास ‘ढाई घर’ अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। वर्ष 1991 में प्रकाशित इस कृति को 1992 में ही ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। गिरिराज किशोर द्वारा लिखा गया ‘पहला गिरमिटिया’ नामक उपन्यास महात्मा गाँधी के अफ़्रीका प्रवास पर आधारित था, जिसने इन्हें विशेष पहचान दिलाई थी।

शिक्षा और कार्यक्षेत्र

गिरिराज किशोर का जन्म 8 जुलाई, 1937 को उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर में हुआ था। अपनी शिक्षा के अंतर्गत उन्होंने ‘मास्टर ऑफ़ सोशल वर्क’ की डिग्री 1960 में ‘समाज विज्ञान संस्थान’, आगरा से प्राप्त की थी। गिरिराज किशोर 1960 से 1964 तक उत्तर प्रदेश सरकार में सेवायोजन अधिकारी व प्रोबेशन अधिकारी भी रहे थे। 1964 से 1966 तक इलाहाबाद में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। फिर जुलाई, 1966 से 1975 तक ‘कानपुर विश्वविद्यालय’ में सहायक और उप-कुलसचिव के पद पर सेवारत रहे। आई.आई.टी. कानपुर में 1975 से 1983 तक रजिस्ट्रार के पद पर रहे और वहाँ से कुलसचिव के पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। वर्ष 1983 से 1997 तक ‘रचनात्मक लेखन एवं प्रकाशन केन्द्र’ के अध्यक्ष रहे। गिरिराज किशोर साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की कार्यकारिणी के भी सदस्य रहे। रचनात्मक लेखन केन्द्र उनके द्वारा ही स्थापित किया गया था। वे हिन्दी सलाहकार समिति, रेलवे बोर्ड के सदस्य भी रहे थे। वर्ष 1998 से 1999 तक संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने गिरिराज किशोर को ‘एमेरिट्स फैलोशिप’ दी। 2002 में ‘छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर द्वारा डी.लिट. की मानद् उपाधि दी गयी। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में मई, 1999-2001 तक फैलोशिप प्राप्तकर्ता रहे।

प्रतिभा सम्पन्न लेखक

गिरिराज किशोर के सम-सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक निबंध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। वे बालकों के लिए लेख लिखा करते थे। इस तरह गिरिराज किशोर एक बहुआयामी प्रतिभा सम्पन्न लेखक थे। उन्हें सर्वाधिक कीर्ति औपन्यासिक लेखन के माध्यम से ही प्राप्त हुई थी ।  अपने जीवन के अंतिम क्षण में वे स्वतंत्र लेखन तथा कानपुर से निकलने वाली हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका ‘अकार’ त्रैमासिक के संपादक के रुप मे सक्रिय रहे।

पुरस्कार और सम्मान

गिरिराज किशोर का उपन्यास ‘ढाई घर’ अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। 1991 में प्रकाशित इस कृति को 1992 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था। महात्मा गांधी के अफ़्रीका प्रवास पर आधारित ‘पहला गिरमिटिया’ भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ, पर ‘ढाई घर’ औपन्यासिक क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुका था । राष्ट्रपति द्वारा 23 मार्च 2007 को ‘साहित्य और शिक्षा’ के लिए ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से विभूषित किया गया था। उत्तर प्रदेश के ‘भारतेन्दु पुरस्कार’ नाटक पर, ‘परिशिष्ट’ उपन्यास पर ‘मध्यप्रदेश साहित्य परिषद’ के ‘वीरसिंह देव पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी सम्मेलन’ के ‘वासुदेव सिंह स्वर्ण पदक’ तथा ‘ढाई घर’ उ.प्र.के लिये हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण’ पुरस्कार से सम्मानित किये गये। ‘भारतीय भाषा परिषद’ का ‘शतदल सम्मान’ मिला। ‘पहला गिरमिटिया’ उपन्यास पर ‘के.के. बिरला फाउण्डेशन’ द्वारा ‘व्यास सम्मान’ और जे. एन. यू. में आयोजित ‘सत्याग्रह शताब्दी विश्व सम्मेलन’ में सम्मानित किया गया।

मृत्यु

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार गिरिराज किशोर का निधन रविवार के दिन 9 फ़रवरी, 2020 को कानपुर में उनके आवास पर हृदय गति रुकने से हुआ। वह 83 वर्ष के थे। अपने लोकप्रिय उपन्यासों जैसे ‘ढाई घर’ और ‘पहला गिरमिटिया’ आदि के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

प्रमुख कृतियां

गिरिराज किशोर ने उपन्यासों के अतिरिक्त दस कहानी संग्रह, सात नाटक, एक एकांकी संग्रह, चार निबंध संग्रह लिख चुके थे।

कहानी संग्रह 

नीम के फूल,चार मोती बेआब,पेपरवेट,रिश्ता और अन्य कहानियां,शहर -दर -शहर,हम प्यार कर लें,जगत्तारनी एवं अन्य कहानियां,वल्द रोज़ी,यह देह किसकी है?,कहानियां पांच खण्डों में ‘मेरी राजनीतिक कहानियां”हमारे मालिक सबके मालिक’,

उपन्यास

लोग (1966),चिड़ियाघर (1968),यात्राएँ (1917),जुगलबन्दी (1973),दो (1974),इन्द्र सुनें (1978),दावेदार (1979),यथा प्रस्तावित (1982),तीसरी सत्ता (1982),परिशिष्ट (1984).असलाह (1987),अंर्तध्वंस (1990),ढाई घर (1991),यातनाघर (1997),पहला गिरमिटिया (1999)

नाटक 

नरमेध,प्रजा ही रहने दो,चेहरे – चेहरे किसके चेहरे,केवल मेरा नाम लो,जुर्म आयद,काठ की तोप

लेख/निबंध

संवादसेतु,लिखने का तर्क,सरोकार,कथ-अकथ,समपर्णी,एक जनभाषा की त्रासदी,जन-जन सनसत्ता

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