जयंती विशेष प्राण – हिंदी सिनेमा का सबसे दमदार विलन जिनकी खलनायकी के सामने बॉलीवुड के बड़े-बड़े सुपरस्टार फीके पड़ जाते थे

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फिल्मों में जितनी अहमियत एक हीरो की होती हैं। उतनी ही अहमियत फिल्मों मे निगेटिव रोल प्ले कर रहे विलन्स की भी होती हैं। किसी भी फिल्म को रोचक और इंटेश बनाने में सबसे बड़ी भूमिका खलनायक की होती हैं। भले ही आजकल के सिनेप्रेमी हीरो को ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन किसी भी फिल्म में कहानी के मुख्य नायक को पब्लिक के सामने हीरो बनाने का श्रेय विलन को ही जाता हैं। क्यों कि विलन ही हीरो को चुनौती देता हैं। जिसे पूरा करने के बाद ही फिल्म का मुख्य किरदार हीरो के रुप में प्रसिद्ध होता हैं। शायद इसी कारण एक अच्छा फिल्म निर्माता अपने फिल्मों में हीरो के बराबर विलन को महत्व देते हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण शोले,शान, मिस्टर इंडिया, बाहुबली और डर जैसी फिल्में हैं। हिंदी सिनेमा में प्रेमनाथ,अजीत, अमजद, अमरीश, कादर खान,प्रेम चोपड़ा,रनजीत और शक्ति कपूर जैसे खलनायक पैदा हुए। जिन्होने अपने जबरदस्त अदायगी से कई हीरो को फेल कर दिया। ऐसे ही एक खलनायक थे प्राण जिनका नाम सुनते ही सारे हीरो के छक्के छूट जाया करते थे। इतने बड़े कलाकार के सामने अभिनय करना हर किसी के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। चाहे वो सदी का महानायक अमिताभ बच्चन हो या ही मैन धरम पा जी हो या फिर उनके समकालीन अभिनेता ट्रैजडी किंग दिलीप कुमार हो। हर एक्टर का पसीना छूट जाया करता था। प्राण साहब ने जितनी शोहरत एक खलनायक के रुप में पायी हैं। उतनी शोहरत शायद ही किसी फिल्म के खलनायक को मिली हो। आलम यह था कि उस दौर कोई भी माता पिता अपने बच्चे का नाम प्राण रखने से कतराता था। उनके इंटेंश लुक,सिगेरट को गजब तरीके से पीने का स्टाईल और उनकी गजब की आदायगी के साथ हल्का सा पॉस देकर बेहतरीन डॉयलाग डिलवरी दर्शकों का दिल जीत लिया करती थी। उन्होंने उस दौर में अपना लोहा मनवाया जब ट्रेजैडी किंग दिलीप कुमार, शोमौन राजकपूर , संवाद के शंहशाह राजकुमार के साथ धर्मेंद्र जितेन्द्र और राजेश खन्ना जैसे कलाकार अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत रहे थे। हिंदी सिनेंमा मे प्राण का नाम उन कलाकारों में शुमार ह। जिन्होने खलनायक के किरदार को पर्दे पर प्रस्तुत करने का एक नया बेंचमार्क सेट किया।

दिल्मी में हुआ जन्म

प्राण का जन्म 12 जनवरी 1920 को दिल्ली में लाला केवलकृष्ण सिकंद के घर हुआ। उनके पिता सरकारी ठेकेदार थे। प्राण की शिक्षा-दीक्षा पंजाब के कपूरथला, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के मेरठ, देहरादून और रामपुर मे हुई। प्राण ने करियर की शुरुआत फोटोग्राफर के तौर पर की थी। वह भी आज के पाकिस्तान के लाहौर से। पर 40 के दशक मे परदे पर उतर आए। पहली फिल्म थी ‘यमला जट’।

हर  किरदार में छोड़ी गहरी छाप

प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में ‘हलाकू’ फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म ‘उपकार’ में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है।

प्राण की यादगार फ़िल्में

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें ‘बॉम्बे टॉकीज’ की फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग-अलग रंग बिखेरे।इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।

नायकों पर भारी पड़ी प्राण की खलनायकी

हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है… यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है। जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग ‘हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है’ का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म ‘खानदान’ से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद ‘जिद्दी’ से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। ‘पूजा के फूल’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया। अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।

उनकी खलनायकी के विविध रूप ‘आजाद’, ‘मधुमती’, देवदास, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘मुनीम जी’ और ‘जब प्यार किसी से होता है’ में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। ‘पत्थर के सनम’ हो या ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘मजबूर’ हो या ‘हाफ टिकट’ या फिर ‘धर्मा’, प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया।

फ़िल्म समीक्षकों की दृष्टि से प्राण

प्रख्यात फ़िल्म समीक्षक अनिरूद्ध शर्मा कहते हैं ‘‘प्राण की शुरुआती फ़िल्में देखें या बाद की फ़िल्में, उनकी अदाकारी में दोहराव कहीं नज़र नहीं आता। उनके मुंह से निकलने वाले संवाद दर्शक को गहरे तक प्रभावित करते हैं। भूमिका चाहे मामूली लुटेरे की हो या किसी बड़े गिरोह के मुखिया की हो या फिर कोई लाचार पिता हो, प्राण ने सभी के साथ न्याय किया है।’’ फ़िल्म आलोचक मनस्विनी देशपांडे कहती हैं कि वर्ष 1956 में फ़िल्म हलाकू मुख्य भूमिका निभाने वाले प्राण ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में ‘राका डाकू’ बने और केवल अपनी आंखों से क्रूरता ज़ाहिर की। लेकिन 1973 में ‘जंजीर’ फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के मित्र शेरखान के रूप में उन्होंने अपनी आंखों से ही दोस्ती का भरपूर संदेश दिया। वह कहती हैं ‘‘उनकी संवाद अदायगी की विशिष्ट शैली लोग अभी तक नहीं भूले हैं। कुछ फ़िल्में ऐसी भी हैं जिनमें नायक पर खलनायक प्राण भारी पड़ गए। चरित्र भूमिकाओं में भी उन्होंने अमिट छाप छोड़ी है।

93 के उम्र में कहा अलविदा

हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेता प्राण का निधन 12 जुलाई, 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती में हुई, वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, “उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।

सम्मान एवं पुरस्कार

प्राण को तीन बार ‘फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता’ का पुरस्कार मिला और 1997 में उन्हें फ़िल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट ख़िताब से नवाजा गया। आज भी लोग प्राण की अदाकारी को याद करते हैं। क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय के अलग अलग रंग बिखेरने वाले प्राण को हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए 2001 में भारत सरकार के पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था। सन् 2012 के लिए भारत सरकार ने प्राण को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

प्राण साहब के कुछ फेमश डायलॉग

फिल्म जंजीर – इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर ख़ान को कौन नहीं जानता। ज़ंजीर

फिल्म उपकार –      राम ने हर युग में जन्म लिया, लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ।

फिल्म उपकार –      ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है।

फिल्म उपकार –      ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना।

कश्मीरी की कली -ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है।

 

 

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