पुण्यतिथि विशेष खुशवंत सिंह – देश का सबसे बेबाक और बिदांस रचनाकार जिन्हे आम आदमी का लेखक कहा जाता था

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खुशवंत सिंह भारत के प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार थे। एक पत्रकार के रूप में इन्होंने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की है। ‘भारत सरकार’ के ‘विदेश मन्त्रालय’ में विदेश सेवा के सम्माननीय पद पर भी खुशवंत सिंह ने कार्य किया है। वर्ष 2000 में इनको ‘वर्ष का ईमानदार व्यक्ति’ सम्मान मिला था। ‘पद्म भूषण’ (1974) और ‘पद्म विभूषण’ (2007) जैसे अलंकरणों से भी इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। खुशवंत सिंह ने कई अमूल्य रचनाएँ अपने पाठकों को प्रदान की हैं। जिसे पढ़कर वे साहित्य रस से ओत प्रोत हो गए। इनकी गिनती देश के उन साहित्यकारों में किया जाता है। जिन्होने लेखनी और पत्रकारिता साथ में की । लेकिन दोनो प्रोफेशन को एक दूसरे के उपर कभी हावी होने नही दिया। आज देश के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार खुशवंत सिंह की 7 वी पुण्य तिथि है। इस अवसर पर जानते है उनके जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें।
पंजाब के ‘हदाली’ में हुआ जन्म

खुशवंत सिंह का जन्म 2 फ़रवरी, 1915 ई. में पंजाब के ‘हदाली’ नामक स्थान (अब पाकिस्तान में) पर हुआ था। खुशवंत सिंह के पिता का नाम सर सोभा सिंह था, जो अपने समय के प्रसिद्ध ठेकेदार थे। उस समय सोभा सिंह को आधी दिल्ली का मालिक कहा जाता था। खुशवंत सिंह ने ‘गवर्नमेंट कॉलेज’, लाहौर और ‘कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी’ में शिक्षा पाई थी। इसके बाद लंदन से ही क़ानून की डिग्री ली। उसके बाद तक वे लाहौर में वकालत करते रहे। 20 मार्च, 2014 को खुशवंत सिंह का निधन गया है।

सबसे बेबाक और बिंदास साहित्यकार

साहित्य के क्षेत्र में जब कभी भी बेबाक और बिंदास शख्सियत का जिक्र होता है । तो वहां खुशवंत सिंह का नाम जरूर लिया जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार खुशवंत सिंह का नांम सबसे पहले आता है। उनके लेखन में आम लोगो के प्रति विशेष प्रकार का लगाव होता था। जो उन्हे आम आदमी का लेखक बनाता था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में पद्मभूषण का सम्मान लौटाया

जीवनभर अपनी शर्तों पर चलने वाले खुशवंत सिंह ने कभी भी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। वह खुद को धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक सिख मानते हैं। यही वजह है कि वह एक तरफ तो खालिस्तान के पैरोकारों की सख्त आलोचना करते हैं। तो दूसरी तरफ स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्यवाही का विरोध भी करते हैं। 1974 में राष्ट्रपति ने खुशवंत सिंह को ‘पद्म भूषण’ के अलंकरण से सम्मानित किया। लेकिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में केन्द्र सरकार की आज्ञा से सेना की कार्यवाही के विरोध में उन्होंने 1984 में लौटा दिया था।

खुशवंत सिंह एक आदमी का लेखक

लेखन और भाषा शैली से आम आदमी को जोड़ने की जो क्षमता खुशवंत सिंह के पास था। वो अंग्रेजी के किसी भी समकालीन लेखक के पास नहीं है। उन्होंने अपने लेखन और कॉलम में बड़े ही सहजता के साथ आम आदमी के साथ संवाद स्थापित किया था। जो हर रचनाकार के बस की बात नही है। अपनी किताब में पूर्व प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह को कहा था ईमानदार नेता जिस मनमोहन सिंह की आज चौतरफा आलोचना हो रही है। उस मनमोहन सिंह को लेखक खुशवंत सिंह ने 2010 में अपनी नई किताब में नेहरू से भी महान प्रधानमंत्री करार दिया था। प्रधानमंत्री की इस ईमानदारी का जिक्र खुशवंत सिंह ने अपनी पुस्तक ‘द एब्सॉल्यूट खुशवंत’ में की है।

उनके शब्दों में “जब लोग ईमानदारी की बात करते हैं तो मैं मनमोहन का उदाहरण उनके सामने रखता हूं कि किस तरह देश के सर्वोच्च पद पर रहते हुए वो कैसा सादा जीवन जीते रहे। खुशवंत सिंह और उनकी रचना ट्रेन टू पाकिस्तान’यह खुशवंत सिंह का वह उपन्यास है, जिससे वे लोकप्रियता के चरम पर पहुंचे थे। अपने जमाने में यह उपन्यास बेहद चर्चित रहा । मतलब उस जमाने के किताबी लोगों ने इसे पढ़ा जरूर। क्या कमाल की किताब है यह! और लिखा भी तो कमाल के लेखक ने ही। इस किताब को खुशवंत सिंह की ‘महान रचना’ कहा जाता है।

प्रमुख रचनाएं

वर्तमान संदर्भों तथा प्राकृतिक वातावरण पर भी उनकी कई रचनाएँ हैं। दो खंडों में प्रकाशित ‘सिक्खों का इतिहास’ उनकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति है। साहित्य के क्षेत्र में पिछले सत्तर वर्ष में खुशवंत सिंह का विविध आयामी योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
‘डेल्ही’
‘ट्रेन टु पाकिस्तान’
‘दि कंपनी ऑफ़ वूमन’

सम्मान तथा पुरस्कार

साल 2000 में उनको ‘वर्ष का ईमानदार व्यक्ति’ सम्मान मिला था।
वर्ष 1974 में राष्ट्रपति ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ के अलंकरण से सम्मानित किया,जो अमृतसर के ‘स्वर्ण मंदिर’ में केन्द्र सरकार की कार्रवाई के विरोध में उन्होंने 1984 में लौटा दिया था।
वर्ष 2007 में इन्हें ‘पद्म विभूषण’ से भी सम्मानित किया गया।

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