जयंती विशेष – अपने हर किरदार मे जान डाल देने के लिए इंडियन सिनेमा में मशहूर थे अभिनेता फारुख शेख

0
62

 

फारुख शेख हिंदी सिनेमा के जाने माने अभिनेता थे। उन्होने सत्तर और अस्सी के दशक में बॉलीवुड में राज किया। उनको दर्शक हमेशा मध्यमवर्गीय युवा के किरदार मे काफी ज्यादा पसंद किया करते थे। फारुख शेख की गिनती इंडियन सिनेमा के बेहतरीन कलाकारो मे होती थी। जो अपने किसी भी किरदार मे जान डाल देते थे। उनकी जोड़ी बॉलीवुड अभिनेत्री दीप्ति नवल के साथ खूब जमा करती थी। वे जब जब एक साथ फिल्मी पर्दे पर आते थे,तो इंडियन बॉक्स ऑफिस पर नया रिकॉर्ड बन जाया करता था।  फारुख शेख एक अभिनेता होने के साथ – साथ समाज-सेवी और एक टेलीविजन प्रस्तोता भी थे। वो सामान्यतः कला सिनेमा में अपने कार्य के लिए प्रसिद्ध थे। जिसे आज के जनरेशन के लोग समानांतर सिनेमा कहते है। उन्होंने सत्यजित राय और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे भारतीय सिनेमा के महान् फ़िल्म निर्देशकों के साथ भी काम किया।

गुजरात में हुआ जन्म

फ़िल्मों के माध्यम से अपनी छवि को आमजन से जोड़ने वाले फ़ारुख़ शेख़ का जन्म 25 मार्च, 1948 को गुजरात के अमरोली में मुस्तफ़ा और फ़रीदा शेख़ के परिवार में हुआ। उनका नाता एक ज़मींदार परिवार से था। फ़ारुख़ शेख़ अपने पांच भाइयों में सबसे बड़े थे। मुंबई के सेंट मैरी स्कूल में शुरुआती शिक्षा ग्रहण करने के साथ ही उन्होंने यहां के सेंट जेवियर्स कॉलेज में आगे की पढ़ाई की। बाद में उन्होंने सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई की।

क्रिकेट प्रेमी थे फारुख

फ़ारुख़ स्कूली दिनों से न केवल क्रिकेट के दीवाने थे, बल्कि अच्छे क्रिकेटर भी थे। उन दिनों भारत के विख्यात टेस्ट क्रिकेटर वीनू मांकड़ सेंट मैरी स्कूल के दो सर्वश्रेष्ठ क्रिकटरों को हर साल कोचिंग देते थे और हर बार उनमें से एक फ़ारुख़ हुआ करते थे। जब वह सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ने गए तो उनका खेल और निखरा। सुनील गावस्कर का शुमार फ़ारुख़ के अच्छे दोस्तों मे होता है।

गरम हवा से मारी बॉलीवुड में एंट्री

वकालत से मोहभंग होने के बाद वे एक्टिंग पर ध्यान देने लगे। उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म ‘गरम हवा’ में मुफ़्त में काम करने को हामी भरी थी। रमेश सथ्यू यह फ़िल्म बना रहे थे और उन्हें ऐसे कलाकार चाहिए थे, जो बिना फीस लिए तारीखें दे दें। खैर, इस फ़िल्म के लिए फ़ारुख़ शेख़ को 750 रुपये मिले, वह भी पांच साल में। फ़ारुख़ शेख़ के वकालत छोड़ कर फ़िल्मों में काम करने से उनके माता-पिता को आश्चर्य तो हुआ लेकिन उन्होंने बेटे के फैसला का विरोध नहीं किया। वे उनके साथ खड़े रहे। फ़ारुख़ के अनुसार उन दिनों तक यह बात ख़त्म चुकी थी कि फ़िल्मों में काम करना बुरा है। ‘गरम हवा’ की रिलीज के बाद फ़ारुख़ के पास दूसरी फ़िल्मों के ऑफर आने लगे। विख्यात निर्देशक सत्यजित रे को उनका काम इतना पसंद आया कि अपनी फ़िल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उन्हें एक रोल ऑफर कर दिया। जब सत्यजित रे ने फोन किया तो फ़ारुख़ कनाडा में थे। उन्होंने कहा कि मुझे लौटने में एक महीने का वक्त लगेगा। सत्यजित रे ने कहा कि वे इंतजार करेंगे।

दीप्ति नवल के साथ जमी जोड़ी

भारतीय अभिनेता, समाजसेवी और टेलीविजन प्रस्तोता रहे फ़ारुख़ शेख़ ने अपने कैरियर की शुरुआत थियेटर से की थी। उन्होंने सागर सरहदी के साथ मिलकर कई नाटक भी किए हैं। बॉलीवुड में उनकी पहली बड़ी फ़िल्म ‘गरम हवा’ थी जो 1973 में आई थी। फिर उसके बाद महान् फ़िल्मकार सत्यजित रे के साथ ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की। शुरुआती सफलता मिलने के बाद फ़ारुख़ शेख़ को आगे भी फ़िल्में मिलने लगीं जिसमें 1979 में आई ‘नूरी’, 1981 की चश्मे बद्दूर जैसी फ़िल्में शामिल हैं। दीप्ति नवल और फ़ारुख़ शेख़ की जोड़ी सत्तर के दशक की सबसे हिट जोड़ी रही। दर्शक इन्हें फ़िल्मों में एक साथ देखना चाहते थे। इन दोनों ने एक साथ मिलकर कई फ़िल्में की इसमें चश्मे बद्दूर, साथ-साथ, कथा, रंग-बिरंगी आदि प्रमुख हैं।

रुपा जैन से किया विवाह

फ़ारुख़ शेख़ अपने कॉलेज के दिनों को हमेशा शिद्दत से याद करते थे। वहां उनके दोस्तों का बड़ा समूह था। यहीं उनकी मुलाकात रूपा जैन से हुई, जो आगे चल कर उनकी जीवन संगिनी बनीं। फ़ारुख़ और रूपा ने नौ साल तक एक-दूसरे से मेल-मुलाकातों के बाद शादी का फैसला लिया था। दोनों ही परिवार उनकी दोस्ती से वाकिफ थे और किसी ने विरोध नहीं किया। हालांकि रूपा के परिजन इस बात से ज़रूर थोड़ा चिंतित थे कि फारुख, जो उन दिनों एक उभरते ऐक्टर थे और ज्यादातर रंगमंच पर काम करते थे, उनकी बेटी का खयाल कैसे रख पाएंगे। लेकिन फ़ारुख़ को जल्द ही मिली कामयाबी के बाद वे निश्चिंत हो गए।

अपने किरदारों को जीवंत कर देने वाले अभिनेता

फ़ारुख़ शेख़ अपने किरदारों में जुझारू, मध्यमवर्गीय और मूल्यजीवी इन्सान के साथ-साथ मनुष्य की फितरत को भी अभिव्यक्त करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी अंतिम कुछ फ़िल्मों में सास बहू और सेंसेक्स, एक्सीडेंट ऑन हिल रोड और लाहौर जैसी फ़िल्में रहीं। इन फ़िल्मों में भी एक बार फिर उनकी परिपक्व छवि दिखी। अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ ऐसे कलाकारों में शुमार हैं जो बड़े और असाधारण श्रेणी के फ़िल्मकारों की फ़िल्मों में एक ख़ास किरदार के लिए पहचाने जाते हैं या फिर उसी ख़ास किरदार के लिए बने हैं। ऐसे अभिनेता पर्दे पर केवल अभिनय नहीं करते बल्कि उस अभिनय को जीते हैं। ऐसे किरदार ही आपके जहन में इतना प्रभाव छोड़ जाते हैं कि आप उन्हें लम्बे समय तक याद रखते हैं। सहज और विनम्र से दिखाई देने वाले फ़ारुख़ शेख़ ने अपने समय के चोटी के निर्देशकों के साथ काम किया है। उन्होंने सत्यजित रे, मुजफ्फर अली, ऋषिकेश मुखर्जी, केतन मेहता, सई परांजपे, सागर सरहदी जैसे फ़िल्मकारों का अपने अभिनय की वजह से दिल जीत लिया।

65 की उम्र में हुआ निधन

बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ का निधन 27 दिसम्बर, 2013 को दुबई में हुआ था। उनके निधन की जानकारी बॉलीवुड अभिनेत्री दीप्ति नवल ने दी। दुबई में औपचारिकता पूरी करने के बाद उनका शव अंतिम संस्कार के लिए मुंबई लाया गया था। मुंबई में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। फ़ारुख़ शेख़ 65 वर्ष के थे। निधन से पहले उनकी तबीयत अच्छी थी। लेकिन अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया  से चल बसे। उनके जाने से हिंदी सिनेमा ने अपना एक ऐसा सितारा खो दिया। जो हैंडसम होने के बाद मसाला फिल्मो के बजाय गरीब और मध्यमवर्गीय लोगो का दर्द बयां करता था।

फारुख शेख की प्रमुख फिल्में

छोटी सी दुनिया (2009)

सास बहू और सैंसेक्‍स (2008)

मोहब्‍बत (1997)

अब इंसाफ होगा (1995)

माया मेमसाब (1993)

जान-ए-वफ़ा (1990)

वफ़ा (1990)

तूफ़ान (1989)

घरवाली बाहरवाली (1989)

बीवी हो तो ऐसी (1988)

खेल मोहब्‍बत का (1988)

पीछा करो (1988)

महानंदा (1987)

एक पल (1986)

फासले (1985)

सलमा (1985)

लोरी (1985)

यहां वहां (1984)

लाखों की बात (1984)

अब आएगा मजा (1984)

कथा (1983)

किसी से न कहना (1983)

रंग बिरंगी (1983)

एक बार चले आओ (1983)

बाज़ार (1982)

साथ साथ (1982)

चश्‍मे बद्दूर (1981)

उमराव जान (1981)

नूरी (1979)

गमन (1978)

शतरंज के खिलाड़ी (1977)

मेरे साथ चल (1974)

गरम हवा (1974)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here