पुण्यतिथि विशेष गणेशशंकर विद्यार्थी – एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला कक रख दी थी

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गणेश युगीन पत्रकारिता हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल माना जाता है। हिंदी पत्रकारिता के पितामह गणेश शंकर विद्यार्थी के बताए या दिखाए रास्ते पर चलकर ही पत्रकारों ने देश और समाज की सेवा की अलख जगाई है। प्रताप के पहले ही अंक में उन्होंने ‘प्रताप की नीति’ नामक लेख में राष्ट्रीय पत्रकारिता की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे आज भी आदर्श पत्रकारिता के घोषणा पत्र के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने लिखा- समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है। हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। हम अपने भाइयों और बहनों को उनके कर्तव्य और अधिकार समझाने का यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। राजा और प्रजा में, एक जाति और दूसरी जाति में, एक संस्था और दूसरी संस्था में बैर और विरोध, अशांति और असंतोष न होने देना हम अपना परम कर्तव्य समझेंगे। गणेशशंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के ‘स्वाधीनता संग्राम’ में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। अपनी बेबाकी और अलग अंदाज़से दूसरों के मुँह पर ताला लगाना एक बेहद मुश्किल काम होता है। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऐसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी थी। वे एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आज़ादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।

इलाहाबाद मे हुआ जन्म

गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल प्रयाग (आधुनिक इलाहाबाद) में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक के पद पर नियुक्त थे और उर्दू तथा फ़ारसी ख़ूब जानते थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा मुंगावली (ग्वालियर) में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फ़ारसी का अध्ययन किया।

व्यावसायिक शुरुआत

गणेशशंकर विद्यार्थी अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण एण्ट्रेंस तक ही पढ़ सके। किन्तु उनका स्वतंत्र अध्ययन अनवरत चलता ही रहा। अपनी मेहनत और लगन के बल ल् उन्होंने पत्रकारिता के गुणों को खुद में भली प्रकार से सहेज लिया था। शुरु में गणेश शंकर जी को सफलता के अनुसार ही एक नौकरी भी मिली थी, लेकिन उनकी अंग्रेज़ अधिकारियों से नहीं पटी, जिस कारण उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।

मानहानि के केस में 7 महीने तक जेल में रहे

गणेश शंकर विद्यार्थी वैसे तो अपनी पूरी जिंदगी में 5 बार जेल गए। आखिरी बार वो 1921 में जेल गए थे। विद्यार्थी जी ने जनवरी, 1921 में अपने अखबार में एक रिपोर्ट छापी थी। रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह के खिलाफ़ वीरपाल ने किसानों पर गोली चलावाई थी और उसका पूरा ब्यौरा प्रताप में छापा गया था। इसलिए प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी और छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकदमा हो गया। ये मुकदमा लड़ने में उनके 30 हजार रुपये खर्च हो गए। पर प्रताप इस केस से फेमस हो गया। खासकर किसानों के बीच विद्यार्थी जी को भी सब लोग पहचानने लगे। उनको लोग प्रताप बाबा कहते थे। इसी दौरान उन पर केस चला, गवाही हुई। गवाह के रूप में इस केस में मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू भी पेश हुए थे। सारी गवाही होने के बाद, फैसला ताल्लुकदार के फेवर में गया,दोनों लोगों पर दो-दो केस थे। दोनों लोगों को 3-3 महीने की कैद और पांच-पांच सौ रुपये का जुर्माना हुआ।

दंगे रोकते-रोकते हुई थी मौत

1931 का वक्त था श,सारे कानपुर में दंगे हो रहे थे। मजहब पर लड़ने वालों के खिलाफ जिंदगी भर गणेश शंकर विद्यार्थी लड़ते रहे थे, वही मार-काट उनके आस-पास हो रही थी। लोग मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मार रहे थे। ऐसे मौके पर गणेश शंकर विद्यार्थी से रहा न गया और वो निकल पड़े दंगे रोकने। कई जगह पर तो वो कामयाब रहे पर कुछ देर में ही वो दंगाइयों की एक टुकड़ी में फंस गए। ये दंगाई उन्हें पहचानते नहीं थे। इसके बाद विद्यार्थी जी की बहुत खोज हुई, पर वो मिले नहीं। आखिर में उनकी लाश एक अस्पताल की लाशों के ढेर में पड़ी हुई मिली। लाश इतनी फूल गई थी कि उसको लोग पहचान भी नहीं पा रहे थे। 29 मार्च को उनको अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस तरह हुई मौत इस बात की गवाही देती है। कि गणेश शंकर विद्यार्थी जितना अपनी कलम से एक्टिव थे उतना ही वो रियल लाइफ में भी एक्टिव थे।

गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें

• 16 साल की उम्र में ही अपनी पहली किताब महात्मा गांधी से इंस्पायर होकर लिख डाली थी। किताब का नाम था हमारी आत्मोसर्गता 1911 में ही उनका एक लेख हंस में छप चुका था। लेख का शीर्षक भी आत्मोत्सर्ग था।
• प्रताप अखबार की शुरुआत विद्यार्थी जी ने 9 नवंबर, 1913 में की थी। विद्यार्थी के जेल जाने के बाद प्रताप का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे बड़े साहित्यकार करते रहे। ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था। उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।
• 1907: इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया।
• 1911: पंडित महाबीर प्रसाद द्वारा संचालित ‘सरस्वती’ पत्रिका का उप-संपादक बनाये गए।
• 1913: कानपुर वापस आ गए और ‘प्रताप’ साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना की और इसके संपादक बन गए।
• 1916: महात्मा गाँधी से पहली बार मिले; स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदे।
• 1917-1918: होम रूल मूवमेंट में सक्रियता से भाग लिया।
• 1920: प्रताप में छपे लेखों के कारण अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
• 1922: जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में प्फिर गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।
• 1925: अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के स्वागत समिति का अध्यक्ष चुने गए।
• 1926-1929: यूनाइटेड प्रोविंस के विधान सभा सदस्य चुने गए।
• 1931: कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में 25 मार्च 1931 को इनकी हत्या हो गई।

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